DC Generator

विद्युत जनित्र (electrical generator)एक ऐसी युक्ती हैं। बहुत से उपकरणों में हमें एक ही दिशा में बहने वाली धारा को जरूरत होती है। इस हेतु दिष्ट धारा जनित्र (Direct Current Generator) का उपयोग किया जाता हैं।जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तन के काम आती हैं।

DC Generator का सिद्धांत principle

Michael Faraday  के विद्युत चुम्बकीय प्ररेण के सिद्धांत पर कार्य करती हैं। 

  1. ऐसी युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा (mechanical energy) को विद्युत ऊर्जा में बदलती हैं।
  2. विद्युत ऊर्जा से प्राप्त विद्युत धारा की दिशा समय के साथ अपरिवर्तित रहती हैं।
  3. विद्युत चुम्बकीय प्ररेण के सिद्धांत पर कार्य करते हैं।
  4. दो सर्पीवलय के स्थान पर विभक्त वलय दिक परिवर्तन का उपयोग किया जाता हैं।

Working principle of DC Generator

डीसी जनैटर परिपथ विद्युत जनित्र का कार्य फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्ररेण के नियम का पालन करता हैं । यह सिद्धांत निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता हैं।
"यदि कोई चालक किसी चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाया जाए तो उसमें विद्युत वाहक बल की उत्पत्ति होती हैं। और यदि संवाहक रूप परिपथ पूर्व हो तो उसमें धारा का प्रवाह भी होने लगता हैं।"

विद्युत शक्ति के तीन मुख्य बातें
  1. चालक
  2. चुम्बकीय क्षेत्र, जिसमें चालक घुमाया जाए 
  3. चालक को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमानेवाली यांत्रिक शक्ति
इसकी मात्रा, चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता, चालक की लम्बाई और चालक के वेग पर निर्भर करती हैं।इसे निम्नलिखित समीकरण से व्यक्त किया जाता हैं।

E = Blv

जहाँ, E = विद्युत वाहक बल (emf)  
B = चुम्बकीय अभिवाह का घनत्व     
l = चालक की लम्बाई     
v = चालक का वेग (क्षेत्र के लम्बवत्)

DC Generator Construction (डी सी जनरेटर की बनावट)

इसकी बनावट भी प्रत्यावर्ती धारा जनित्र जैसी ही होती हैं अन्तर केवल इतना हैं दो सर्पीवलय के स्थान पर विभक्त वलय दिक परिवर्तन का उपयोग किया जाता हैं। इसमें धातु की एक वलय लेते है जिसके दो बराबर भाग C1 व C2 करते है जिन्हें कम्यूटेटर कहते हैं। आर्मेचर का एक सिरा कम्यूटेटर C1 के एक भाग से तथा दूसरा सिरा कम्यूटेटर C2 के दूसरे भाग से जुड़ा होता है C1 व C2 दो कार्बन ब्रुशों B1 व B2 को स्पर्श करते हैं।

DC Generator Working (डी सी जनरेटर की कार्यविधि)


 जब आर्मेचर को चुम्बकीय क्षेत्र में धुमाया जाता हैं। तब कुण्डली से पारित चुम्बकीय फ्लक्स में लगातार परिवर्तन होने से उसमें प्रेरित धारा बहती हैं।उसमें ब्रुश B1 व B2 की स्थितियाँ इस प्रकार समायोजित की जाती हैं। कि कुण्डली में धारा की दिशा परिवर्तित होती है तो ठीक उसी समय इन ब्रुशों का सम्बन्ध कम्यूटेटर के एक भाग से हटकर दूसरे भाग से हो जाता है और बाह्य परिपथ में धारा की दिशा समय के साथ नियत रहती हैं।

माना कि प्रथम आधे च्रक में प्रेरित धारा की दिशा इस प्रकार होती है कि कुण्डली C1 से जुड़ा सिरा धनात्मक व C2 से जुड़ा सिरा त्रणात्मक होता हैं इस स्थिति में ब्रुश B1 धनात्मक व ब्रुश B2 त्रणात्मक होते हैं। अगले आधे च्रक में कुडण्ली में धारा की दिशा जैसे ही बदलती हैं C1 त्रणात्मक C2 धनात्मक हो जाते है लेकिन कुण्डली के घूमने के कारण C1 घूमकर C2 के स्थान पर (B1 के सम्पर्क में) तथा C2 घूमकर C1 के स्थान पर(B1 के सम्पर्क में) आ जाते हैं अतः B1 सदैव धनात्मक व B2 त्रणात्मक रहता है इस प्रकार एक पूर्ण च्रक में बाह्य परिपथ में धारा की दिशा B1 से B2 की ओर बहती हैं।

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