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 Human digestive organ system 

मानव शरीर संरचना प्रकृति की एक अद्भुत विशिष्ट  संरचना है
 जो विभिन्न प्रकार से संरचनात्मक इकाइयों का परस्पर समन्वय करके  संचालित होता हैं
कोशिका शरीर की मूलभूत आवश्यक संरचनात्मक तथा क्रियात्मक इकाई है।
 विभिन्न कार्यों हेतु भिन्न-भिन्न कोशिकाएँ कार्य करती हैं
 समान कार्य करने वाली सभी कोशिकाएँ मिल कर ऊतकों का निर्माण करती है जैसे पेशी, अस्थि आदि  दो या दो से अधिक तरह के उत्तक मिल कर किसी कार्य के संपादन हेतु विशेष क्रिया करते है।
 उदाहरण—  के तौर पर पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र आदि ये सभी तंत्र सम्मिलित रूप से मानव शरीर की रचना करते है

पाचन तंत्र (Digestive System)

मानव भोजन के द्वारा शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा एवं कायिक पदार्थ प्राप्त करता है।
भोजन विभिन्न घटकों जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन, खनिज व लवण आदि से बना होता है भोजन में इनमें से अधिकतर घटक जटिल अवस्था में होते है शरीर में अवशोषण हेतु इन्हें सरलीकृत किया जाता है
 इस प्रक्रिया को संपादित करने हेतु भोजन के अन्तर्गहण से लेकर मल त्याग तक एक तंत्र जिसमें अनेकों अंग, ग्रंथियाँ आदि सम्मिलित है, सामंजस्य के साथ कार्य करते है यह तंत्र पाचन तंत्र कहलाता है।
 पाचन में भोजन के जटिल पोषक पदार्थों व बड़े अणुओं को विभिन्न रसायनिक क्रियाओं तथा एंजाइमों की सहायता से सरल, छोटे व घुलनशील पदार्थों में परिवर्तित किया जाता है।

Human digestive organ system


पाचन तंत्र में सम्मिलित विभिन्न अंग व ग्रन्थियां निम्नानुसार है

 (अ) अंग


  1. मुख (Mouth)
  2. ग्रसनी (Pharynx)
  3. ग्रासनली (Oesophagus)
  4. आमाशय (Stomach)
  5. छोटी आंत (Small intestine)
  6. बड़ी आंत (Large intestine)
  7. मलद्वार (Rectum)

(ब) ग्रन्थियां 

  1. लार ग्रन्थि (Salivary gland)
  2. यकृत ग्रन्थि (Liver)
  3. अग्नाशय (Pancreas)
सभी अंग मिलकर आहार नाल (Alimentary Canal) का निर्माण करते है
जो मुख से शुरू होकर मलद्वार तक जाती है यह करीब 8-10 मीटर लंबी होती है इसे पोषण नाल (Digestive Canal) भी कहा जाता हैं।

आहार नाल के तीन प्रमुख कार्य होते है 
  1. आहार को सरलीकृत कर पचाना 
  2. पचित आहार का अवशोषण 
  3. आहार को मुख से मलद्वार तक पहुँचना 
पाचन कार्य को करने के लिए आहार नाल मे पाए जाने वाली ग्रन्थियों या अन्यत्र उपस्थित ग्रन्थियों द्वारा उत्पन्न पाचक रस (Digestive juices) उत्तरदायी होते है
पाचक रस एन्जाइम द्वारा विभिन्न रसायनिक क्रियाओं द्वारा भोजन को सरलीकृत कर देते हैं। तथा उसे शरीर द्वारा ग्रहण किए जाने वाले रूप में परिवर्तित करते है
पाचित भोजन रस में अनेक प्रकार घटक पाए जाते है जैसे प्रोटीन, लवण, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज,जल आदि।
 इन पोषक तत्वों को आहार नाल के विभिन्न घटक विशेष कोशिकाओं की मदद से अवशोषित करते हैं।
 मुख से ग्रसित भोजन अपनी लंबी यात्रा में विभिन्न स्तरों पर संवरणी पेशियाँ (Sphincters) भोजन, पचित भोजन रस तथा अवशिष्ट की गति को नियंत्रित करती है।

Human Mouth anatomy  

आहारनाल का अग्र भाग से प्रारंभ होकर मुख-गुहा में खुलता है। यह एक कटोरे नुमा (Boul shaped)अंग हैं। इसके ऊपर कठोर तथा नीचे कोमल तालु पाए जाते हैं। मुख गुहा में ही चारों ओर गति कर सकने वाली पेशी निर्मित जिह्वा पाई जाती हैं। जिह्वा मुख गुहा के पृष्ठ भाग में आधार तल से फ्रेनुलम लिंगुअल (Frenulum lingual) या जिह्वा फ्रेनुलम (Frenulum) के द्वारा जुड़ी जाती है तथा मुख गुहा के मध्य भाग तक जाती हैं।
मुख दो मॉसल होठों (Lips) से घिरा रहता है जो मुख को खोलने बंद करने तथा भोजन को पकड़ने में सहायक होते है।मुख के ऊपर व नीचे के भाग में एक-एक जबड़े में 16-16 दाँत पाए जाते हैं। सभी दाँत जबड़े में पाए जाने वाले एक साँचे में स्थित होते है। इस साँचे को मसूडा़ (Gum) कहा जाता हैं। मसूड़ों तथा दाँतों की इस स्थिति को गर्तदंती (Thecodont) कहा जाता है। मानवों में द्विबारदंती (Diphyodont) दाँत व्यवस्था पाई जाती हैं जिसमें जीवन काल में दो प्रकार के दाँत आते है अस्थायी दाँत (दूध के दाँत) तथा स्थायी दाँत

दाँत चार प्रकार के होते हैं

  1. कृंतक (Incisors )
  2. रदनक Canines)
  3. अग्र-चवर्णक (Premolars)
  4. चवर्णक (Molars)
कृंतक (Incisors) ये सबसे आगे के दाँत होते है जो कुतरने तथा काटने का कार्य करते है। ये छ: माह की उम्र में निकलते हैं।


रदनक (Canines)ये दाँत भोजन को चीरने फाडने का कार्य करते हैं। ये 16-20 माह की उम्र में निकलते हैं। ये प्रत्येक जबड़े में 2-2 होते है मांसाहारी पशुओं में ज्यादा विकसित होते हैं।


अग्र-चवर्णक (Premolars)ये भोजन को चबाने में सहायक होते हैं। तथा प्रत्येक जबड़े में 4-4 पाए जाते है ये 10-11 वर्ष की उम्र में पूर्ण रूप से विकसित होते हैं।

चवर्णक (Molars) ये दाँत भी भोजन चबाने में सहायक होते है तथा प्रत्येक जबड़े में 6-6 पाए जाते है प्रथमत ये 15-16 माह की उम्र में निकलते है। 

ग्रसनी (Pharynx )

मुख गुहा जिह्वा व तालु (Palate) के पिछले भाग में एक छोटी सी कुप्पीनूमा (Sac or flask shaped) ग्रसनी से जुड़ी होती है ग्रसनी से होकर भोजन आहार नलिका या ग्रासनाल (Grossal) तथा वायु श्वासनाल में जाती है। ग्रसनी अपनी संरचना से ये सुनिश्चित करती हैं कि भोजन श्वासनाल व वायु भोजन नाल में प्रवेश ना कर सके। इन दोनों नालों के मुख ग्रसनी के नीचे की तरफ स्थित होते हैं आगे के भाग में श्वासनाल  स्थित होती हैं। व पृष्ठ भाग में ग्रासनाल स्थित होती हैं।

लार ग्रन्थि में विभिन्न प्रकार के एंजाइम(Enzyme) स्त्रावित होते हैं। 
टायलिन (Ptylin) व एमिलेज (Amylase)
टायलिन (Ptylin)का कार्य जटिल पॉलीसैकेराइड (जैसे स्टार्च, ग्लाइकोजन) को सरलीकृत कर छोटे पॉलीसैकेराइड, माल्टोस में परिवर्तन कर देती हैं।
एमिलेज (Amylase) का कार्य जटिल सरलीकृत करतीं हैं।

 ग्रसनी  तीन भागों में विभक्त किया जाता हैं-


  1. नासाग्रसनी (Nasopharynx)
  2. मुख -ग्रसनी (Oropharynx)
  3. कंठ-ग्रसनी या अधो-ग्रसनी (Laryngopharynx or Hypopharynx)

ग्रासनली (Oesophagus)


यह एक संकरी पेशीय नली है जो करीब 25 सेंटीमीटर लंबी होती है यह ग्रसनी के निचले भाग से प्रारंभ होकर ग्रीवा (Cervix) तथा वक्षस्थल से होती हुई मध्यपट (Diaphragm) से निकल कर उदरगुहा में प्रवेश करती हैं । इस का मुख्य कार्य भोजन को मुख गुहा से आमाशय (Stomach) में पहुँचाता हैं। 
ग्रासनली में कुछ श्लेषमा ग्रंथियाँ मिलती हैं इन ग्रंथियो से स्त्रावित श्लेष्म भोजन को लसदार बनाता हैं। ग्रासनली में उपस्थित भित्तियाँ भोजन को एक प्रकार की गति क्रंमाकुचन गति (Peristalsis) प्रदान करती हैं जिसके माध्यम से भोजन आमाशय तक पहुँचता हैं। ग्रासनली के शीर्ष पर उत्तको को एक पल्ला (Flap) होता हैं। यह पल्ला घाटी ढक्कन या एपिग्लॉटिस(Epiglottis) कहलाता हैं।
भोजन निकलने के दौरान यह पल्ला (घाटी ढक्कन या Epiglottis) बंद हो जाता है तथा भोजन को श्वासनली में प्रवेश होने  से रोकता हैं।

लार ग्रन्थि (Salivary Gland)

यह मुँह में लार उत्पन्न करती हैं। लार एक सीरमी (Serum) तरल तथा एक चिपचिपे श्लेषमा का मिश्रण होता हैं। तरल भाग भोजन को गीला करता हैं तथा श्लेषमा लुब्रिकेंट के तौर पर कार्य करता हैं। लार का मुख्य कार्य भोजन में उपस्थित स्टार्च (Starch) का मुख में पाचन शुरू करना, भोजन को चिकना व घुलनशील बनना तथा दाँतों, मुख ग्रहिका व जीभ की सफाई करना हैं।

लार ग्रन्थि तीन प्रकार की होती हैं


  1. कर्णपूर्ण ग्रन्थि (Parotid Gland) यह सीरमी तरल का स्त्राव करती है तथा गालो में पाई जाती हैं।
  2. अधोजंभ / अवचिबुकीय लार ग्रन्थि (Submandibular  Salivary gland) यह एक मिश्रित ग्रन्थि है जिससे तरल तथा श्लेष्मिक स्त्रावण होता हैं।
  3. अधोजिह्वा ग्रन्थि (Sublingual gland) यह जिह्वा के नीचे पाई जाती हैं तथा श्लेष्मिक स्त्रावण करती हैं।

आमाशय (Stomach )

आहारनाल का ग्रासनली से आगे का भाग आमाशय है। यह एक पेशी J आकर की संरचना है जो ग्रासनली व ग्रहणी (Duodenum) के मध्य तथा उदरगुहा (Abdominal Cavity ) के बांए हिस्से तथा मध्यपट के पीछे स्थित होता हैं। जो लचीला अंग है इसमें 1-3 लीटर तक आहार धारित कर सकता हैं।

 दो प्रकार के एंजाइम पाए जाते हैं 


  1. पेप्सिन (Pepsin )
  2. रेनिन (Renin)


पेप्सिन (PepsinPepsin) का कार्य प्रोटीन की जटिल क्ष्रंखलाओं को सरलीकृत कर पेप्टाइड में परिवर्तन कर देते हैं।

रेनिन (Renin) का कार्य केसीन की जटिल क्ष्रंखलाओं को सरलीकृत कर पैराकेसीन में परिवर्तन कर देते हैं।

आमाशय (Stomach) को तीन भागों में बाँटा जा सकता हैं।


कार्डियक या जठरगम भाग
 यह आमाशय का बांया बड़ा भाग है
 जो ग्रसिका आमाशय में प्रविष्ठ होती हैं।
जठर निर्गमी भाग
 यह आमाशय का दाहिना छोटा भाग हैं
 जो आमाशय छोटी आँत से जुडता हैं।
फंडिस भाग 
यह कार्डियक तथा जठर निर्गमी भाग
 दोनों भागों के मध्य की संरचना हैं।

    आमाशय नलिका अवरोधिनी या संकोचक पेशियाँ (Sphincters) पाई जाती हैं। 

    ये दोनों पेशियाँ आमाशय की सामग्री को अंतर्विष्ट (Inclusive)करती हैं।
    1. ग्रास नलिका अवरोधनी (Cardiac or lower esophageal sphincter) :-  यह ग्रसिका व आमाशय को विभाजित करती है तथा आमाशय से अम्लीय भोजन को ग्रसनी में जाने से रोकती हैं।
    2. जठरनिर्गमीय अवरोधिनी (Pyloric sphincter) :-  आमाशय व छोटी आँत को विभाजित करती हैं तथा आमाशय से छोटी आंत्र में भोजन निकास को नियंत्रित करती हैं।
    आमाशय रस (Gastric juice )
    आमाशय के अस्तर से स्त्रावित खट्टा द्रव्य, रंगहीन होता है। जिसमें 90% जल, 0.5% हाइड्रोक्लोरिक अम्ल(HCL) तथा रेनिन, लाइपेज एवं पेप्सीन एन्जाइम होते हैं। इसके
    इसका PH मान 1.5 होता है।

    आमाशय का कार्य
    • भोजन को संग्रह करता है।
    • प्रोटीन का पाचन सर्वप्रथम यहां प्रारंभ होता है।
    • आमाशय के हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ( HCL) भोजन को अम्लीय बनाने के साथ भोजन के साथ आते जीवाणुओं को मार डालता है
    • पेप्सीन HCL के साथ मिलकर प्रोटीन अणुओं को पेप्टोन एवं प्रोटीओजेज में बदल देता है
    • रेनिन (Renin) दूध में पाये जाने वाले प्रोटीन कैसीनोजन को कैसीन में बदल देता है। जिसका पाचन पेप्सीन द्वारा होता है।
    • आमाशय (Stomach) पानी, एल्कोहल, ग्लुकोज एवं कई प्रकार की दवाइयों को अवशोषित भी करता है।

    छोटी आंत (Small intestine )

    छोटी आँत पाचन तंत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग हैं। जो आमाशय के जठरनिर्गमीय (Pyloric) भाग से शुरू होकर बड़ी आंत पर पूर्व होती हैं। मानव में इसकी औसत लंबाई सात मीटर होती हैं तथा आहार नाल के छोटी आंत द्वारा ही भोजन का सर्वाधिक पाचन तथा अवशोषण (Absorption)होता हैं।

     तीन भागों में विभक्त किया गया है।


    1. ग्रहनी या ड्योडीनम (Duodenum)
    2. अग्रक्षुदांत्र या जेजुनम ( Jejunum)
    3. क्षुदांत्र या इलियम  (Ileum)

    1. ग्रहनी या ड्योडीनम (Duodenum) आमाशय से जुड़ा हुआ यह छोटी आंत का पहला तथा सबसे छोटा भाग हैं। जो भोजन के रसायनिक पाचन (एंजाइमों द्वारा ) में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं।
    2. अग्रक्षुदांत्र या जेजुनम  (Jejunm) यह छोटी आंत का मध्य भाग हैं। यहाँ ग्रहणी में पाचित आहार रस का अवशोषण किया जाता हैं। मुख्यतः अवशोषण का कार्य विशेष प्रकार की कोशिकाओं जिन्हें आन्त्रकोशिका (Enterocyte) कहा जाता है के द्वारा संपादित किया जाता हैं।
    3. क्षुदांत्र या इलियम (Ileum) यह छोटी आँत का अंतिम भाग हैं जो बड़ी आँत में खुलता हैं। यह भाग उन पोषक तत्वों [ विशेष रूप से पित्त लवण (Bile salts) व विटामिनों ] का अवशोषण करता हैं ।
    छोटी आंत का कार्य

    • छोटी आंत के ड्योडिनम में अग्नाशय (Pancreas) द्वारा स्त्रावित पाचक रस (Pancreatic juice) आता है। जो पाचन का माध्यम क्षारीय बनाता है। Ph 7.1 से 8.2 तक होता है।मुख्यत एमाइलेज, सुक्रेज, माल्टेज , लाइपेज (Pancreatic lipase) काइमोट्रीप्सीनोजन एवं ट्रिप्सीनोजन एन्जाइम होते हैं।
    • कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं वसा का पाचन हो जाता है।
    • पचे हुए भोजन का अवशोषण भी करती है।

    आंत्र रस का नाम एवं कार्य
    1. पेप्टीडेज (Peptidase) प्रोटीन क पेप्टोन पर क्रिया कर अमीनो अम्ल में बदलता है।
    2. माल्टेज (Maltase) माल्टोज पर क्रिया कर उसे ग्लुकोज में बदलता है।
    3. सुक्रेज (Sucrase) सुक्रोज शर्करा को ग्लुकोज व फ्रक्टोज में बदलता है।
    4. लैक्टेज (Lactase) दूध शर्करा पर क्रिया करके उसे ग्लुकोज व गैलैक्टोज में बदल देता है।
    5. लाइपेज (Lipase) वसा पर कार्य कर वसीय पदार्थों को वसीय अम्ल एवं ग्लिसरोल में परिवर्तित करता है। 
    6. एन्टरोकाइनेज (Enterokinase) यह एन्जाइम अग्नाशय द्वारा स्त्रावित निष्क्रिय ट्रिप्सिनोजन को सक्रिय ट्रिप्सिन में बदल देता है।
    7. न्यूक्लिएजेज (Nucleases) यह न्यूक्लिक अम्ल वर्षा न्यूक्लिओटाइड को न्यूक्लिओसाइड वह शर्करा में परिवर्तित करता है।
    8. फोस्फेटेज(Phosphatase ) यह न्यूक्लिओटाइड को नाइट्रोजन क्षार वह राइबोज में परिवर्तित करता है।

    बड़ी आँत (Large intestine)

    क्षुदांत्र (Ileum) आगे बड़ी आँत से जुड़ा होता हैं। यहाँ कुछ विशेष जीवाणु पाए जाते हैं। ये जीवाणु छोटी आँत से शेष बचे अपाचित भोजन को किण्वन क्रिया (Fermentation) द्वारा सरलीकृत कर पाचन में मदद करते हैं। बड़ी आँत का मुख्य कार्य जल व खनिज लवणों का अवशोषण करता है तथा अपाचित भोजन को मलद्वार से उत्सर्जित करना हैं।

    तीन भागों में विभक्त किया गया हैं

    1. अधान्त्र अथवा अंधनाल या सीकम (Cecum)
    2. वृहदान्त्र या कॉलन (Colon)
    3. मलाशय  (Rectum)

    1. अधान्त्र अथवा अंधनाल या सीकम (Cecum) यह भाग क्षुदांत्र (Ileum) से जुड़ा होता हैं। यहाँ क्षुदांत्र से आने वाले पाचित आहार रस का अवशोषण होता हैं तथा शेष बचे अपशिष्ट को आगे कॉलन (Colon) में पहुँचा दिया जाता हैं। अंधनाल के प्रथम भाग (जो क्षुदांत्र से जुड़ा होता हैं) से थोड़ा नीचे भीतर की ओर होता है। तथा 4-5 इंच लंबा नली के आकार का अंग निकला रहता हैं। इसे कृमिरूप परिशेषिका (Vermiform appendix) अपेन्डिक्स कहा जाता हैं।
    2. वृहदान्त्र या कॉलन (Colon) आहार नाल मे बड़ी आँत का अंधान्त्र के आगे वाला भाग वृहदान्त्र कहलाता हैं यह उल्टे U के आकार की करीब 1.3 मीटर लंबी नलिका होती हैं। अन्दर की सतह पर सूक्ष्म अंकुर (Microvilli) नहीं होते हैं तथा गोबलेट कोशिका (Goblet cell ) म्यूकस स्त्रावित करती है।

    वृहदान्त्र चार भागों में विभक्त होती हैं 
    (अ) आरोही वृहदान्त्र (Asending colon) करीब 15 सेंटीमीटर लंबी नलिका होती हैं।

    (ब) अनुप्रस्थ वृहदान्त्र (Transverse colon) करीब 50 सेंटीमीटर लंबी नलिका होती हैं।

    (स) अवरोही वृहदान्त्र (Descending colon) करीब 25 सेंटीमीटर लंबी नलिका होती है।

    (द) सिग्माकार वृहदान्त्र (Sigmoid colon) करीब 40 सेंटीमीटर लंबी नलिका होती हैं।

    3. मलाशय (Rectum) मलाशय आहारनाल का अंतिम भाग होता हैं। यह करीब 20 सेंटीमीटर लंबा होता हैं। मलाशय के अंतिम 3 सेंटीमीटर वाले भाग को गुदानाल(Anal canal) कहा जाता हैं। गुदानाल मलद्वार (Anus) के रास्ते बाहर खुलता हैं। मलद्वार पर आकर आहारनाल समाप्त होती हैं। गुदानाल में दो संवरणी बहि: और अतः संवरणी (Sphicters) पाए जाती हैं। पाचित आहार रस के अवशोषण के पश्चात शेष बचे अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालती हैं अपशिष्ट पदार्थों कि निकलने की प्रक्रिया को ये संवरणी पेशियाँ (Embolic muscles)  नियंत्रित करती हैं।

    बड़ी आंत का कार्य

    • खनिज लवण, जल तथा औषधि,  का अवशोषण (Absorption) करती हैं।

    •  श्लेष्म एन्जाइम द्वारा मलद्वार को चिकना बनाती हैं।

    Human digestive organ system | shirswastudy Human digestive organ system | shirswastudy Reviewed by shirswastudy on April 08, 2019 Rating: 5

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