विद्युत ऊर्जा (Electrical energy ) विद्युत ऊर्जा के प्रकार

विद्युत ऊर्जा (Electrical energy )

आवेशित कणों में निहित ऊर्जा विद्युत ऊर्जा कहलाती है।जब कण आवेशित होते हैं तो आवेशित कणों के चारों ओर विद्युत क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। यह विद्युत क्षेत्र समीप के दूसरे आवेशित कणों पर बल निरूपित करता है एवं उन्हें गति प्रदान करता है जिससे ऊर्जा का संचरण होता है।
धनावेशित कणों द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र दूसरे धनावेशित कणों को प्रतिकर्षित करता है एवं ऋणावेशित कणों द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र दूसरे धनावेशित कणों को आकर्षित करता है। परिपाटी के अनुसार विद्युत क्षेत्र की दिशा हमेशा उस ओर इंगित करती है जिधर एक धनावेशित कण उस क्षेत्र में गति करेगा। अतः धनावेशित कणों द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र को धनात्मक बिन्दु से बाहर की ओर निकलता हुआ दर्शाया जाता है। जबकि ऋणावेशित कणों द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र को ऋणात्मक बिन्दु के अन्दर की ओर जाते हुए दर्शाया जाता है।

आवेशित कणों की स्थिति के कारण उनमें स्थितिज ऊर्जा होती है। विद्युत क्षेत्र द्वारा जब इन कणों पर बल लगाया जाता है तो ये एक निश्चित दिशा में गमन करते हैं।
उदाहरणत: यदि एक धनावेशित कण को ऋणावेशित स्त्रोत से दूर ले जाना हो तो हमें बाह्य बल लगाना होगा। इस प्रक्रिया में धनावेशित कण की स्थितिज ऊर्जा बढ़ जाएगी।जैसे ही बाह्य बल को हटाया जाएगा कण विद्युत क्षेत्र में ज्यादा स्थितिज ऊर्जा से कम स्थितिज ऊर्जा की ओर गमन करने लगेगा। इसी तरह धनावेशित कण स्वाभाविक प्रक्रिया स्वरूप ऋणावेशित स्त्रोत की तरह गति करेगा। इस प्रक्रिया में आवेशित कणों की स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदल जाएगी। यह ऊर्जा हमें विद्युत ऊर्जा के रूप में मिलेगी।
दैनिक जीवन में विद्युत ऊर्जा का उपयोग हम घरों में विद्युत धारा एवं विद्युत विभव के रूप में लेते है। हमारे द्वारा उपयोग में आने वाले विभिन्न उपकरण एवं युक्तियों जैसे कि बल्ब, पंखा, विद्युत प्रेस, हेयर-ड्रायर, गीजर, मोबाइल आदि में विद्युत ऊर्जा का उपयोग होता है। एक बार जब विद्युत ऊर्जा अन्य स्वरूप में बदल जाती है तो हमें प्रकाश, ऊष्मा, गतिज एवं अन्य ऊर्जा प्राप्त होती है। विद्युत का उत्पादन भी विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा होता है।
सन् 1831 में माइकल फैराडे ने विद्युत जनित्र की खोज की।
आज भी मुख्य रूप से जनित्र में चुम्बकीय ध्रवों के मध्य तार अथवा कॉपर डिस्क सेे विद्युत उत्पादन होता है।
वर्तमान में विभिन्न प्रकार के विद्युत संयंत्रों के माध्यम से विद्युत ऊर्जा प्राप्त की जाती है। जिनमें से मुख्य निम्न प्रकार है।


  1. कोयला संयंत्र (Coal Plants)
  2. नाभिकीय संयंत्र (Nuclear plant )
  3. जल विद्युत संयंत्र(Hydroelectric power plant)
  4. पवन ऊर्जा संयंत्र (Wind power plant)
  5. सौर ऊष्मा संयंत्र(Solar heat plant)
  6. सौर प्रकाश वोल्टीय ऊर्जा संयंत्र (Solar light voltaic power plant)

1.कोयला संयंत्र (Coal Plant)

इसमें कोयले में स्थित रासायनिक ऊर्जा का दहन कर ऊष्मा प्राप्त की जाती है। इस ऊष्मा से उच्च कोटि के परिशुद्ध पानी को भाप में बदला जाता है। यह भाप टरबाइन को गति देती है एवं टरबाइन घूमने लगती है। इस टरबाइन से जुड़ी हुई जनित्र से विद्युत उत्पादन होता है।
कोयला संयंत्र 

2.  नाभिकीय संयंत्र (Nuclear plant)

इन संयंत्रों में नाभिकीय विखंडन से प्राप्त ऊष्मा ऊर्जा से पानी को वाष्प में बदला जाता है। इस वाष्प द्वारा टरबाइन एवं टरबाइन एवं जनित्र की सहायता से विद्युत उत्पादन होता हैं। नाभिकीय विखंडन से ऊष्मा प्राप्त होने के बाद की प्रक्रिया लगभग कोयला संयंत्र जैसी होती है।
नाभिकीय संयंत्र

3. जल-विद्युत संयंत्र (Hydroelectric power plant)

जल विद्युत संयंत्रों में बाँध बनाकर पानी की स्थितिज ऊर्जा को बढाया जाता है। इस ऊर्जा को पानी की गतिज ऊर्जा में बदलकर टरबाइन को धुमाया  जाता है। टरबाइन के घूमने पर उससे जुड़े जनित्र द्वारा विद्युत उत्पादन होता है।


4. पवन ऊर्जा संयंत्र (Wind power plant)

पवन चक्की में हवा की गतिज ऊर्जा से टरबाइन घूमाकर जनित्र द्वारा उत्पादन किया जाता है। यह नवीनकरणीय ऊर्जा दूसरे ऊर्जा संयंत्रों के मुकाबले में वातावरण के लिए हितकारी है।



5. सौर ऊष्मा संयंत्र (Solar heat plant)

सूर्य से प्राप्त होने वाला ऊर्जा को लेन्स व दर्पणों की सहायता से केन्द्रित करके इसे ऊष्मा में बदला जाता है। इस ऊष्मा से भाप टरबाइन को धुमाया जाता है जिससे जनित्र विद्युत उत्पादन करता है।a

6. सौर प्रकाश वोल्टीय ऊर्जा संयंत्र (Solar light voltaic power plant)

इन संयंत्रों में खुली जगह या छतों पर सौर पेनल लगाये जाते है। इन पेनलों में प्रकाश वोल्टीय सेल होते है। सूर्य की किरणें जब पेनल के सेल पर आपतित होती है तो ये सेल प्रकाश के फोटॉन ग्रहण करके इलेक्ट्रॉन को उत्तेजित अवस्था में ले आते है। ये आवेशित कण विद्युत धारा के रूप में परिपथ को विद्युत प्रदान करते है। वर्तमान में इस तरह के छोटे-छोटे संयंत्र घरों की छतों पर लगाये जा रहे है। साथ ही दो तरफा विद्युत मीटर भी लगाये जा रहे है जिससे घर की आवश्यकता से अधिक ऊर्जा विद्युत प्रदाता कम्पनी को स्थानांतरित हो जाती है। कंपनी इसका तय दर से उपभोक्ता को भुगतान भी करती है।


विद्युत ऊर्जा के कुछ उदाहरण 

  1. एक कार बैटरी में रासायनिक क्रिया द्वारा इलेक्ट्रॉन बनते है जो विद्युत धारा के रूप में गति करते है। ये गतिमान आवेश कार में विद्युत परिपथ को विद्युत ऊर्जा प्रदान करते है।
  2. जब हम एक लाईट बल्ब का स्विच चालू करते है तो विद्युत धारा परिपथ से होते हुए बल्ब तक पहुँचती है। बल्ब के फिलामेंट में विद्युत आवेश की गति कम होती है एवं फिलामेंट में ऊष्मा बढती है। एक निश्चित सीमा तक ऊष्मा बढ़ने पर फिलामेंट से प्रकाश ऊर्जा मिलती है।
  3. मोबाइल फोन में बैटरी से रासायनिक ऊर्जा विद्युत आवेशों को मिलती है। जिससे आवेश गति करते हैं। यह विद्युत ऊर्जा फोन के परिपथ में गमन करती है फोन में विद्युत प्रवाह होता है।
  4. एक इलेक्ट्रॉन हीटर या स्टोव को जब विद्युत परिपथ से जोड़ा जाता है तो गतिमान विद्युत आवेश उपकरण में जाते है। यह विद्युत ऊर्जा फिलामेंट में ऊष्मा ऊर्जा में बदल जाती है। जिसे हम खाना पकाने अथवा अन्य कार्यों में उपयोग में लेते है।
  5. हमारे शरीर में खाना पचाने के बाद प्राप्त ऊर्जा का कुछ भाग विद्युत ऊर्जा में बदल जाता है जो हमारे स्नायु तंत्र से होकर मस्तिष्क तक पहुँचता है। इसके अलावा हृदय की धड़कनों के लिये भी विद्युत संकेतों की आवश्यकता होती है। मस्तिष्क द्वारा जो भी संकेत शरीर के किसी भी अंग तक पहुँचाये जाते है वो विद्युत पल्स के रूप में ही होते है।

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