Lokokti (proverbs) लोकोक्तियाँ : lokokti in hindi [HINDI GRAMMAR]

Lokokti (proverbs) लोकोक्तियाँ

पूरी दुनिया में सभी भाषाओं में लोकोक्तियों का प्रचलन है मनुष्य अपनी बात को और अधिक पर भावपूर्ण बनाने के लिए लोकोक्तियों का प्रयोग करता है

लोकोक्तियां (Proverbs) की परिभाषा

किसी विशेष स्थान पर प्रसिद्ध हो जाने वाले कथन को लोकोक्ति कहते हैं। लोकोक्ति शब्द लोक + उक्ति के योग से बना है लोकोक्तियों का निर्माण किसी घटना विशेष का विशेष योगदान होता है

 मुहावरे  और लोकोक्तियां में अन्तर (Differences between locales and idioms)

लोकोक्ति का अपन नाम कहावत है लोकोक्ति की जहां अपने आप से पूर्ण होती है और पराए प्रयोग में एक वाक्य के रूप में ही प्रयुक्त होती है लोकोक्ति का रूम पर आए एक सा ही रहता है जबकि मुहावरा वाक्यांश मात्र होता है जबकि मुहावरे के समरूप लिंग वचन एवं काल के अनुसार परिवर्तन होता है

Lokokti (proverbs) लोकोक्तियाँ   lokokti in hindi  [HINDI GRAMMAR]

यहां पर महत्वपूर्ण लोकोक्ति उनके अर्थ दिऐ गये है

  1. अंत भला तो सब भला : कार्य का अन्तिम चरण ही महत्त्वपूर्ण होता है।
  2. अंधा पीसे कुत्ता खाय : मूखों की मेहनत का लाभ अन्य उठाते हैं। असावधानी से अयोग्य को लाभ।
  3. अंधा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर : स्वार्थी व्यक्ति अधिकार पाकर अपनों को देय अपने लोगों की सहायता करता है।
  4. अंधे के हाथ बटेर लगना :  अयोग्य व्यक्ति को बिना परिश्रम संयोग से अच्छी वस्तु मिलना।
  5. अंधों में काना राजा : मूखों में कम ज्ञान वाला भी आदर पाता है।
  6. अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता : अकेला व्यक्ति शक्ति हीन होता है।
  7. अकेला हँसता भला, न रोता भला : दुःख-सुख में साथी होने चाहिए।
  8. अक्ल बड़ी या भैंस : शारीरिक बल से बुद्धिबल श्रेष्ठ होता है।
  9. अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम : ईश्वर सबकी आवश्यकताएं पूरी करता है।
  10. अटका बनिया देय उधार : दबाव पड़ने पर सब कुछ करना पड़ता है।
  11. अधजल गगरी छलकत जाय : ओछा आदमी अधिक इतराता है।
  12. अन्धा का जाने बसन्त बहार : जिसने जो वस्तु देखी ही न हो. वह उसका आनन्द क्या जाने।
  13. अन्धा क्या चाहे दो आँखें : बिना प्रयास वांछित वस्तु का मिल जाना।
  14. अन्धे के आगे रोवै अपने नैना खावें :  निर्दय व्यक्ति या अयोग्य व्यक्ति  से सहानुभूति की अपेक्षा करना व्यर्थ है।                                                             
  15. अन्धेर नगरी चौपट राजा : प्रशासन की अयोग्यता से सर्वत्र अराजकता आ जाना।
  16. अपना रख, पराया चख : अपना बचाकर दूसरों का माल हड़प करना
  17. अपना हाथ जगन्नाथ : अपना काम अपने ही हाथों ठीक रहता है।
  18. अपनी करनी पार उतरनी : स्वयं का परिश्रम ही काम आता है।
  19. अपनी गरज बावली : स्वार्थी मनुष्य दूसरों की चिन्ता नहीं करता
  20. अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है : अपने क्षेत्र में कमजोर भी बलवान  बन जाता है।
  21. अपनी नाक कटे तो कटे, दूसरे का सगुन तो बिगड़े : दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए स्वयं की हानि के लिए भी तैयार रहना।
  22. अपनी पगड़ी अपने हाथ : अपनी प्रतिष्ठा अपने हाथ
  23. अपनी-अपनी डपली : तालमेल का अभाव/सबका अपना-अपना राग अलग-अलग मत होना/एकमत का अभाव
  24. अपने किये का क्या इलाज? : अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है।
  25. अपने झोपड़े की पैर मनाओ : अपनी कुशलता देखो।
  26. अपने पूत को कोई काम नहीं कहता : अपनी ख़राब चीज़ को कोई ख़राब नहीं कहता
  27. अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं दिखता : स्वयं अपने-आप प्रयत्न करने पर ही काम बनता है।
  28. अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत : अवसर निकल जाने पर पछताने  से कोई लाभ नहीं।
  29. अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान : ईश्वर की कृपा से अयोग्य भी योग्य बन जाता है।
  30. आ बैल मुझे मार :  जानबूझ कर मुसीबत में फंसना
  31. आँख एक नहीं, कजरौटा दस-दस : व्यर्थ का आडम्बर
  32. आँख और कान में चार अंगुल का फ़र्क : आँखों-देखी विश्वसनीय है, कानो सनी नहीं।
  33. आँख का अंधा नाम नयन सुख :  गुणों के विपरीत नाम होना।
  34. 'आग' कहते मुँह नहीं जानता :  नाम लेनेमात्र से कोई हानि लाभ नहीं होता।
  35. आग का जला आग ही से अच्छा होता है : कष्ट देने वाली वस्तु से ही कष्ट का निवारण भी होता है।
  36. आग खायेगा तो अंगार उगलेगा : बुरे काम का बुरा नतीजा
  37. आगे कुऔं पीछे खाई : दोनों/सब ओर से विपत्ति में फँसना
  38. आगे नाथ न पीछे पगहा : जिसका कोई न हो
  39. आज का बनिया कल का सेठ : निरन्तर कार्य करने से व्यक्ति प्रगति करता है।
  40. आठ कनौजिए नौ चूल्हे : फूट होना।
  41. आठ बार नौ त्यौहार : मौज-मस्ती का जीवन
  42. आदमी की दवा आदमी है : मनुष्य की सहायता मनुष्य ही करता है।
  43. आदमी बसे और सोना कसे :  साथ रहने पर मनुष्य की और कसौटी पर सोने की परख होती है। मनुष्य के चरित्र और सोने के गुण की पहचान तुरन्त नहीं होती।
  44. आधा तीतर आधा बटेर : अनमेल मिश्रण/बेमेल चीजें जिनमें सामंजस्य का अभाव हो।
  45. आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे; आधी तज सारी को धावे, आधी रहे न सारी पावे : अधिक लालच करने से गाँठ की भी हानि होती है।
  46. आप भला जग भला : अपने अच्छे व्यवहार से सब जगह आदर मिलता है।
  47. आप भला तो जग भला : सभी अपने जैसा दिखाई देना।
  48. आम के आम गुठली के दाम : हर प्रकार का लाभ/एक काम से दो लाभ
  49. आप मियाँजी माँगते द्वार खड़े दरवेश : दीन-हीन व्यक्ति किसी की सहायता नहीं कर सकता।
  50. आयी तो रोज़ी नहीं तो रोज़ा : कमाया तो खाये, नहीं तो भूखे।
  51. आयी है जान के साथ, जाएगी जनाज़े के साथ : असाध्य रोग
  52. आये की ख़ुशी, न जाए का ग़म : हर हालत में एक-जैसी स्थिति।
  53. आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास  : उद्देश्य से भटक जाना/श्रेष्ठ काम करने की बजाय  तुच्छ कार्य करना/कार्य विशेष की उपेक्षा कर किसी अन्य कार्य में लग जाना।
  54. आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास : प्रमुख कार्य के उद्देश्य को छोड़कर अन्य कार्य में लग जाना।
  55. आसमान पर थूका मुँह पर आता है : बड़े लोगों की निन्दा करने से अपनी ही बदनामी होती है।
  56. आसमान से गिरा खजूर में अटका : एक मुसीबत से निकलकर  दूसरे में फँसना; किसी काम का बड़ी जगह में ठीक होकर छोटी जगह में रुक जाना।
  57. इक नागिन अरु पंख लगायी : एक दोष के साथ दूसरे का जुट जाना
  58. इन तिलों में तेल नहीं :  यहाँ से कुछ भी हासिल होन वाला नहीं
  59. इन तिलों में तेल नहीं : किसी लाभ की आशा न होना।
  60. ईंट की देवी, माँगे का प्रसाद : व्यक्ति के अनुसार आवभगता
  61. ईंट की लेनी, पत्थर की देनी : दुष्ट के साथ अधिक दुष्टता।
  62. उधार का खाना, फूस का तापमा : फूस की आग और उधार का धन अधिक समय तक साथ नहीं देता।
  63. उलटे बाँस बरेली को : विपरीत काम करना।
  64. उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे : अपना अपराध न मानना और पूछने वाले को ही दोषी ठहराना।
  65. उल्टे बाँस बरेली को : विपरीत कार्य या आचरण करना
  66. ऊँची दुकान फीका पकवान : वास्तविकता से अधिक दिखाया। दिखावा ही दिखाया। केवल बाहरी दिखाया।
  67. ऊँट किस करवट बैठता है : परिणाम में अनिश्चितता होना।
  68. ऊँट के मुँह में जीरा : आवश्यकता की नगण्य पूर्ति
  69. ऊँटाक चून चौबारे रसोई : केवल दिखावा।
  70. ऊखली में सिर दिया तो मूसल का क्या डर :  जब दृढ निश्चय कर लिया तो  बाधाओं से क्या घबराना
  71. ऊधो का न लेना, न माधो का देना :  किसी से कोई मतलब न रखना/ सबसे अलग।
  72. एक अनार सौ बीमार :  वस्तु कम्, चाहने वाले अधिक/ एक स्थान के लिये सैकड़ों प्रत्याशी
  73. एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा : बुरे से और अधिक बुरा होना/ एक बुराई के साथ दूसरी बुराई का जुड़ जाना।
  74. एक तो करैला कडुवा, दूसरे नीम चढ़ा, एक तो करला दूजे. नीम चढ़ा - बुरे लोगों का पारस्परिक संयोग
  75. एक पंथ दो काज : एक काम से दोहरा लाग/एक तरकीब से दो कार्य करना/एक साधन से दो कार्य करना।
  76. एक मछली सारा तालाब गंदा कर देती है। : एक की बुराई से साथी भी बदनाम  कर देती है। होते हैं।
  77. एक म्यान में दो तलवारें नहीं समा सकतीं : दो प्रशासक एक ही जगह एक साथ शासन नहीं कर सकते।
  78. एक हमाम में सब नंगे :  सहयोगी एक-दूसरे की दुर्बलताएँ जानते हैं।
  79. एक हाथ से ताली नहीं बजती : लड़ाई का कारण दोनों पक्ष होते हैं।
  80. एकहि साधे सब सधै : मूल कार्य की ओर ध्यान जाना चाहिए।
  81. ऐरे-गैरे नत्थू खैरे : व्यर्थ के व्यक्ति
  82. औसर चूकी डोमिनी गावे ताल-बेताल : समय के चूक जाये/ पर उत्तेजना के वशीभूत होकर उलटा
  83. कंगाली में आटा गीला : संकट पर संकट आना।
  84. क़ब्र में पाँव लटकाना : मरणासन्न व्यक्ति।
  85. कभी नाव गाड़ी पर कभी गाड़ी नाव पर : एक-दूसरे के काम आना  परिस्थितियों बदलती रहती हैं।    raj
  86. कमरी ओढ़ने से कोई फ़क़ीर नहीं होता : ऊपरी दिखावे से दोष नहीं छुपते।
  87. कर बहियाँ बल आपणी छाडि पराई आस : अपनी ही शक्ति पर विश्वास करना; दूसरों पर आशा न करना।
  88. कहने पर कुम्हार गधे पर नहीं चढ़ता  : कहने से जिद्दी व्यक्ति काम नहीं करता।
  89. कहाँ राम-राम, कहाँ टाँय-टॉय : अच्छी चीज़ से किसी निम्नकोटि की वस्तु की तुलना नहीं हो सकती।
  90. कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा :  अलग-अलग स्वभाव वालों को एक जगह एकत्र करना/इधर-उधर से सामग्री जुटा कर कोई निकृष्ट वस्तु का निर्माण करना।
  91. का वर्षा जब कृषि सुखानी : अवसर बीत जाने पर साधन की प्राप्ति बेकार है।
  92. कागज की नाव नहीं चलती : बेइमानी से किसी कार्य में सफलता नहीं मिलती।
  93. काजी जी दुबले क्यों शहर के अन्देशे से - अपनी चिन्ता न करके दूसरों की चिन्ता करना।
  94. कान में तेल डाले बैठे रहना : कुछ सुनने को तैयार न रहना।।
  95. कानी के ब्याह में सौ जोखिम : एक कमी होने पर लोग अनेक कमियाँ निकालते हैं।
  96. काबुल में क्या गधे नहीं होते : मूर्ख सब जगह मिलते हैं।
  97. काला अक्षर मैंस बराबर : बिल्कुल निरक्षर होना।
  98. काले के आगे दीया नहीं जलता : बलवान के आगे किसी का  वश नहीं चलता।
  99. कुएँ की मिट्टी कुएँ में ही लगती है : जहाँ से मिला हो, वहीं लगाना।
  100. कुत्ते को घी नहीं पचता : निम्नकोटि का व्यक्ति उच्च पद पाकर घमण्ड करने लगता है।
  101. कोउ नृप होउ हमें का हानि : अपने काम से मतलब रखना।
  102. कोयल होय न उजली सौ मन साबुन लगाइ : लाख प्रयत्न करने पर भी स्वभाव नहीं बदला जा सकता।
  103. कोयले की दलाली में हाथ काले :  बुरे काम का परिणाम भी बुरा  होता है। दुष्टों की संगति से कलंकित होते हैं।
  104. कौवा चला हंस की चाल : दूसरों के अनधिकार अनुकरण
  105. खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे : क्रोधावेश में अनुचित कार्य कर बैठना।
  106. खेती खसम लेती : कोई काम स्वयं करना ही ठीक रहता है।
  107. गँवार गन्ना न दे, भेली दे : गवार सिधाई से कम मूल्य की वस्तु न देकर, अधिक मूल्य की वस्तु दे देता है। 
  108. गप्पी होना
  109. गाय को अपनी सींग भारी नहीं लगती : अपने परिवार के लोग कष्टकारी नहीं जान पड़ते।
  110. गुरु कीजै जान, पानी पीजै छान : अच्छी तरह से सोच समझकर कोई काम करना।
  111. गोद में बैठकर आँख में अँगुली; गोदी में बैठकर दाढ़ी नोचना : भलाई के बदले बुराई का व्यवहार करना।
  112. घर आये कुत्ते को भी नहीं भगाते : घर आनेवाले का आदर सत्कार कला चाहिए।
  113. घर आये नाग न पूजै. बाँबी पुजन जाय : अवसर का लाभ न उठाकर उसकी  खोज में जाना
  114. चंदन की चुटकी भली गाड़ी : अच्छी वस्तु तो थोड़ी भी भली
  115. घर बैठे गंगा आना : बिना प्रयत्न के लाभ, सफलता मिलना
  116. घर में नहीं दाने बुढ़िया चली मुनाने : झूठा दिखावा करना
  117. चट मँगनी पट ब्याह : शीघ्रता से प्रस्तावित कार्य का सम्पन्न हो जाना।
  118. चमगादड़ के घर मेंहमान आये, हम भी लटकें तुम भी लटको : गरीब आवभगत में असमर्थ होता है।
  119. चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाए: बहुत कंजूस होना।
  120. चलती का नाम गाड़ी :काम का चलते रहना/बनी बात के सब साथी होते हैं।
  121. चार दिन की चौदनी फिर अंधेरी रात: सुख का समय थोड़ा ही  होता है।
  122. चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता  : निर्लज्ज पर किसी बात का असर नहीं होता।
  123. चिड़िया अपनी जान से गयी, खानेवाले को स्वाद न आया : अथक प्रयास और हानि के बावुजूद भी प्रशंसा न होना।
  124. चिराग तले अँधेरा : दूसरों को उपदेश देना स्वयं अज्ञान में रहना
  125. चींटी के पर निकलना: बुरा समय आने से पूर्व बुद्धि का, नष्ट होना
  126. चील के घोंसले में माँस कहाँ?: भूखे के घर भोजन मिलना असंभव होता है
  127. चुपड़ी और दो-दो : लाभ में लाभ होना
  128. चूहे के चाम से नगाड़े नहीं मढ़े जाते : तुच्छ और अल्प वस्तु से बड़ा काम नहीं हो सकता
  129. चोर की दाड़ी में तिनका : अपराधी का सशंकित होना अपराधी के कार्यों से दोष प्रकट हो जाता है।
  130. चोर से कहे चोरी कर साहू से कहे जागते रहो : दो पक्षों को लड़ाने का प्रयत्न करना।
  131. चोर-चोर मौसेरे भाई : दुष्ट लोग प्रायः एक जैसे होते हैं एक से स्वभाव वाले लोगों में मित्रता होना
  132. चोरी का माल मोरी में : बुरी कमाई बुरे कार्यों में नष्ट होती है
  133. छछुंदर के सिर में चमेली : अयोग्य व्यक्ति के पास अच्छी  वस्तु होना
  134. छोटे मुंह बड़ी बात : हैसियत से अधिक बातें करना
  135. जंगल में मोर नाचा किसने देखा : दूसरों के सामने उपस्थित होने पर ही गुणों की  कद्र होती है। गुणों का प्रदर्शन उपयुक्त स्थान पर।
  136. जड़ काटते जाएं, पानी देते जाएँ :  भीतर से दुश्मनी, ऊपर से दोस्ती
  137. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी : मातृभूमि का महत्व स्वर्ग से भी बढ़कर है।
  138. जब तक साँस तब तक आस : जीवन पर्यन्त आशान्चित रहना
  139. जबान ही हाथी चढ़ावै, जबान ही सिर कटावै : बोली से ही सम्मान और बोली से अपमान होता है।
  140. जल में रहकर मगर से बैर : बड़े आश्रयदाता से दुश्मनी ठीक नहीं
  141. जस दूल्हा तस बनी बराता : बुरों का बुरों के साथ मिलना; अपने समान ही संगति रखना।
  142. जहाँ काम आवै सुई का करे तरवारि : छोटी वस्तु से जहाँ काम निकलता  है वहाँ बड़ी वस्तु का उपयोग नहीं होता है।
  143. जहाँ गुड़ होगा वहीं मक्खियाँ होंगी : जहाँ कोई आकर्षण होगा, वहाँ भीड़ भागेगी ही।
  144. जहाँ न पहुंचे रवि वहाँ पहुँचे कवि : कवि दूर की बात सोचता है  सीमातीत कल्पना करना
  145. जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी : भावनानुकूल (प्राप्ति का होना)  औरों को देखना
  146. जहाँ मुर्गा नहीं बोलता वहाँ क्या सबेरा नहीं होता :  किसी के बिना कोई काम नहीं  रुकता कोई अपरिहार्य नहीं है।
  147. जाके पैर न फटी बिवाई. सो क्या जाने पीर पराई : जिसने कभी दुःख नहीं देखा वह  दूसरों का दुख क्या अनुभव करे   
  148. जाको राखे साइयों मारि सके न कोय : ईश्वर रक्षक हो तो फिर डर  किसका, कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
  149. जादू वही जो सिर चढ़कर बोलेः उपाय यही अच्छा जो कारगर हो
  150. जान बची और लाखों पाये : प्राण सबसे प्रिय होते हैं।
  151. जितनी डफली उतने राग : भिन्न-भिन्न मत होतना।
  152. जितने मुँह, उतनी बातें : सबके भिन्न-भिन्न विचार।
  153. जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ : प्रयत्न करने वाले को सफलता /लाभ अवश्य मिलता है।
  154. जिस थाली में खाये उसी में छेद करना : विश्वासघात करना। भलाई करने  वाले का ही बुरा करना। कृतघ्न होना
  155. जिसकी लाठी उसकी भैंस : शक्तिशाली की विजय होती है 


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