प्रयोगशाला विधि ( Laboratory Method)

विज्ञान की शिक्षा वास्तव में प्रयोगशाला में ही संभव है। इसलिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली में प्रायोगिक कार्य पर विशेष बल दिया गया है। प्रायोगिक विधि में विज्ञान विषय से संबंधित उपकरणों, आवश्यक वस्तुओं आदि की सहायता से विज्ञान के नियमों, सिद्धांतों एवं अवधारणाओं का प्रायोगिक सत्यापन किया जाता है। इस विधि में विद्यार्थी व्यक्तिगत रूप से सहयोग प्रयोग कर प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करते हैं।

प्रयोगशाला विधि ( Laboratory Method)


प्रयोगशाला में ‘करके सीखना' , ‘निरीक्षण करके सीखना', ' ज्ञात से अज्ञात जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है।जो सीखने में सहायक होते हैं।

विद्यार्थी उचित अवलोकन एवं परीक्षण के द्वारा निष्कर्ष तक पूछते हैं। यदि विद्यार्थी को प्रयोग के दौरान कोई कठिनाई होती है तो शिक्षक उनकी सहायता करते हैं और उनकी समस्या का समाधान करते हैं इस विधि में विद्यार्थी पूर्ण रूप से सक्रिय होते हैं। यह करके सीखने पर आधारित होने के कारण अत्यंत प्रभावी विधि है उच्च प्राथमिक शालाओं में प्राय प्रयोगशाला कक्षा उपलब्ध न होने पर प्रायोगिक सामग्रियों को एकत्र कर कक्षा कक्ष में ही प्रायोगिक कार्य संपन्न कराया जा सकता है।

प्रयोगशाला विधि के गुण

  • यह मनोवैज्ञानिक विधि है।
  • बालक को केंद्र मानना
  • इसमें वैज्ञानिक प्रक्रिया निहित होती है।
  • इसके द्वारा विद्यार्थियों में प्रायोगिक कार्य हेतु कौशल विकास होता है।
  • इस विधि द्वारा प्राप्त ज्ञान स्पष्ट एवं स्थाई होता है।
  • इस विधि द्वारा विद्यार्थियों में वांछित गुणों एवं मूल्यों का विकास होता है।
  • इस विधि द्वारा अध्यापक एवं विद्यार्थी के मध्य संबंध शुदृढ़ होते हैं।
  • गुणों का विकास छात्रों में ईमानदारी, परिश्रम की महत्ता, खोज, एकाग्रता, अवलोकन जैसे गुणों का विकास किया जाता है।
  • ज्ञानेन्द्रियो का प्रयोग इस विधि द्वारा एक साथ कई ज्ञानेन्द्रियो का प्रयोग कर लेते हैं। जिससे ज्ञान स्थायी हो जाता है।
  • गणित शिक्षण के सिद्धांतों का प्रयोग

प्रयोगशाला विधि के दोष

  • इस विधि में समय अधिक लगता हैं।
  • खर्चीली विधि इस विधि से शिक्षण करने में एक प्रयोग शाला के लिए बड़ा कमरा तथा एक से अधिक शिक्षकों की भी जरूरत होगी।
  • इस विधि के प्रयोग हेतु विद्यार्थियों का कुशल होना आवश्यक है।
  • विज्ञान के प्रत्येक प्रकरण को प्रायोगिक विधि द्वारा विस्तार देना संभव नहीं है।
  • उच्च प्राथमिक स्तर पर विद्यार्थियों में प्रायोगिक कुशलता का अभाव होता है अतः दुर्घटना की आशंका को देखते हुए शिक्षक को अत्यधिक सत्र रहने की आवश्यकता होती है।
  • यदि विद्यार्थियों की संख्या अधिक हो तो यह विधि शिक्षक के लिए कठिन साबित होती है क्योंकि उसे प्रत्येक विद्यार्थी पर ध्यान देना होता है।

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