Sandhi-संधि किसे कहते हैं संधि के प्रकार-गुण-संधि-दीर्घ-वृद्धि-यण्-अयादि

Sandhi-संधि किसे कहते हैं संधि के प्रकार-गुण-संधि-दीर्घ-वृद्धि-यण्-अयादि 

दो वर्णें (व्यंजन या स्वर ) के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) संधि कहते हैं। अर्थात् शब्दों या शब्दांशों के मिलने से नया शब्द बनने पर उनके निकटवर्ती वर्णों में होने वाले परिवर्तन को संधि कहते हैं।संधि निरथर्क अक्षरों मिलकर सार्थक शब्द बनती है। संधि में प्रायः शब्द का रूप छोटा हो जाता है। संधि संस्कृत का शब्द है।


Sandhi-संधि किसे कहते हैं संधि के प्रकार-गुण-संधि-दीर्घ-वृद्धि-यण्-अयादि

संधि का शाब्दिक अर्थ मेल, योग, जोड़
सम्+धि – अच्छी तरह मिलना
न + इति = नेति
बाल + इन्दु = बालेन्दु

नोट:- यदि वर्णों के मेल से कोई परिवर्तन न हो और वर्ण ज्यों की त्यों आकर जुड़ जाए तो वह संधि नहीं संयोग कहलाता है संयोग में कोई संधि नियम लागू नहीं होता है
जैसे  पंख + जो = पंकज
युग + बोध = युगबोध
थाने + दार थानेदार
नोट :- संधि में चार प्रकार से परिवर्तन होता है।

  1. विकार
  2. लोप 
  3. आगम 
  4. प्रकृति भाव
विकार :- जब दो वरण मिलने और उनमें परिवर्तन हो जाए तो उसे विकार कहा जाता है
 जैसे
ऋतु + अंत = ऋत्वंत
द्वि + अर्थी = द्वव्यर्थी
लोप :- जब दो वर्ण मिले और कोई एक वर्ण लुप्त हो जाए तो उसे लोप कहा जाता ह।
जैसे
पक्षिन् + राज = पक्षिराज
मंत्रिन् + मण्डल = मंत्रिमंडल
आगम :- जब दो वरण मिले तथा कोई तीसरा वर्ण और आ जाए तो उसे आगम कहा जाता है।
जैसे
सम् + कार = संस्कार
वि + छेद = विच्छेद
प्रकृति भाव :- जान संधि नियम तो लागू हो फिर भी संधि नहीं हो और वररण जो कि तू आकर जुड़ जाए तो उसे प्रकृति भाव कहते है।
जैसे
सु + अवसर = सुअवसर
सु + ओष्ठ = सुओष्ठ
संधि विच्छेद- उन पदों को मूल रूप में पृथक कर देना संधि विच्छेद है।
रवि + ईश = रवीश
नव + ऊढ़ा = नवोढ़ा
अद्य + एवं = अद्यैव

संधि के भेद (Sandhi ek parkar)

मुख्य रूप से संधि को वर्णों के आधार पर तीन भागों में बांटा गया है।

  1. स्वर संधि (vowel sandhi)
  2. व्यंजन संधि(Combination of Consonants)
  3. विसर्ग संधि (Combination Of Visarga)
1. स्वर या अच् संधि [vowel sandhi]

 दो वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है उसे स्वर या अच् संधि कहते हैं।
रवि + ईश = रवीश
रवि + उदय = रव्युदय
वि + उत्पन्न = व्युत्पन्न
गुरू + आदेश = गुर्वादेश

स्वर संधि के भेद 

स्वर संधि के मुख्य रूप से पांच भेद है।

1. दीर्घ संधि
2. गुण संधि
3. वृद्धि संधि
4. यण संधि
5. अयादि संधि

दीर्घ संधि

यदि प्रथम पद के अंत में अ, इ, उ, ऋ (हृस्व या दीर्घ) में से कोई एक स्वर आये तथा दूसरे पद के प्रारंभ में कोई समान स्वर वर्ण आए तो दोनों के स्थान पर दीर्घ स्वर हो जाता है।
पहचान:- यदि किसी शब्द में आ, ई, ऊ, ऋ में से कोई एक वर्ण आये तो वहां दीर्घ संधि होती है।
अ/आ + अ/आ = आ
इ/ई + इ/ई = ई
उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ
ऋ + ऋ = ॠ
अ/आ + अ/आ = आ
स्व + अभिमान = स्वाभिमान
स्व + अधीन = स्वाधीन
क्रम + अंक = क्रमांक
अन्त्य + अक्षरी = अन्त्याक्षरी
पूर्व + अहन् = पूर्वाहन्
अक्ष + अंश = अक्षांश
रूद्र + अक्षि = रूद्राक्ष
प्राप्त + अंक = प्राप्तांक
गीत + अवलि = गीतावलि
नयन + अंबु = नयनांबु
इ/ई + इ/ई = ई
हरि + इच्छा = हरीच्छा
प्रति + इक = प्रतीक
अधि + ईक्षक = अधीक्षक
अभि + ईप्सा = अभीप्सा
शची + इन्द्र = शचीन्द्र
फणी + इन्द्र = फणीन्द्र
गौरी + ईश्वर = गौरीश
श्री + ईश = श्रीश
परि + ईक्षा = परीक्षा
अति + इत = अतीत
उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ
सु + उक्ति = सूक्ति
लघु + उत्तर = लघूत्तर
लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
वधू + उत्सव = वधूत्सव
भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व
सरयू + ऊर्मि = सरयूर्मि
बहु + ऊर्जा = बहूर्जा
मंजु + उषा = मंजूषा
ऋ + ऋ = ॠ
नोट संस्कृत व्याकरण में इस प्रकार की संधि प्रचलित है। परन्तु हिंदी में नहीं है।
पितृ + ऋण = पितृण



गुण संधि 

यदि प्रथम पद के अंत में अ, आ मे से कोई एक स्वर वर्ण आये तथा दूसरे पद के प्रारंभ में इ, ई, आये तो ए, तथा उ, ए आये तो ओ और ऋ आये तो अर् तथा लृ आये तो अल् हो जाता है।
पहचान:- यदि किसी शब्द में 'ए' की एक मात्रा तथा 'ओ' की मात्रा और 'अर्' या अल् ध्वनि आये तो वहां गुण संधि होगी।
अ/आ + इ/ई = ए
आ/अ + उ/ए = ओ
अ/आ + ऋ अर्
अ/आ + इ/ई = ए
स्व + इच्छा = स्वेच्छा
प्र + ईक्षक = प्रेक्षक
यथा + इष्ट = यथेष्ट
प्र + इषिति = प्रेषित
हृषीक + ईश = हृषीकेश
न + इति = नेति
अंक + ईक्षण = अंकेक्षण
अप + ईक्षा = अपेक्षा
अन्त्य + इष्टि = अन्त्येष्टि
द्वारका + ईश = द्वारकेश

अ/आ + उ/ए = ओ
सर्व + उदय = सर्वोदय
सर्व + उपरि = सर्वोपरि
नव + ऊढ़ा = नवोढ़ा
जल + ऊष्मा = जलोष्मा
स्व + उपार्जित = स्वोपार्जित
अतिशय + उक्ति = अतिशयोक्ति
समुद्र + ऊर्मि = समुद्रोर्मि
लोक + उक्ति = लोकोक्ति
प्राण + उत्सर्ग = प्राणोत्सर्ग
पद + उन्नति = पदोन्नति
अ/आ + ऋ अर्
देव + ऋषि = देवर्षि
उत्तम + ऋण = उत्तमर्ण
वर्षा + ऋतु = वर्षर्तु
साम + ऋचा = सामर्चा
देव + ऋषभ = ऋषभदेव
महा + ऋद्वि = महर्द्वि
अधम + ऋण =अधमर्ण
राज + ऋषि = राजर्षि
महा + ऋण = महर्ण
बसन्त + ऋतु = बसन्तर्तु

वृद्धि संधि 

यदि प्रथम पद के अंत में अ, आ में से कोई एक स्वर आते तथा दूसरे पद के प्रारंभ में ए, ए आये तो दोनों के स्थान पर 'ऐ' तथा आगे ओ, और आये तो दोनों के स्थान पर 'औ' हो जाता है।
अ/आ + ए/ए = ए
आ/अ + ओ/और = औ
अ/आ + ए/ए = ए
एक + एक = एकैक
धन + एषी = धनैषी
सदा + एवं = तथैव
मत + ऐक्य = मतैक्य
स्व + ऐच्छिक = स्वैच्छिक
लोक + एषणा = लोकैषणा
पुत्र + एषणा = पुत्रैषणा
प्रिय + एषी = प्रियैषी
सा + एषा = सैषा
सर्वदा + एवं = सर्वदैव
अ/आ + ओ/और = औ
महा + औदार्य = महौदार्य
जल + ओक = जलौक
गंगा + ओघ = गंगौघ
देव + औदार्य = देवौदार्य
महा + औदार्य = महौदार्य
वृथा + औदार्य = वृथौदार्य
भाव + औदार्य = भावौदार्य
धन + औषधि = वनौषधि
प्र + औद्योगिक = प्रौद्योगिकी

यण संधि 

प्रथम पद के अंत में इ, उ, ऋ, (हृस्व या दीर्घ) मैं से कोई एक स्वर आए तथा दूसरे पद के प्रारंभ में कोई असमान स्वर आए तो 'इ' को य् , 'उ' को व् , 'ऋ' को र् तथा 'लृ' को ल् हो जाता है।
‘यण’ संधि का संस्कृत। में सूत्र हैं “इको यणचि”
पहचान :- यदि “य, व, र, ल से पहले कोई आधा अक्षर आए तो वहां यण् स्वर संधि होती है
इ/ई + असमान स्वर = य्
उ/ऊ + असमान स्वर = व्
ऋ + असमान स्वर = र्
लृ + असमान स्वर = ल्
इ/ई + असमान स्वर = य्
अभि + अर्थी = अभ्यर्थी
यदि + अपि = यद्यपि
परि + आप्त = पर्याप्त
नि + उन = न्यून
प्रति + आशी = प्रत्याशी
परि + अंक = पर्यंक
नारी + उचित = नार्युचित
आदि + अन्त = आद्यन्त
त्रि + अक्षर = त्र्यक्षर
प्रति + आरोप = प्रत्यारोप
उ/ऊ + असमान स्वर = व्
सु + आगत = स्वागत
सु + अल्प = स्वल्प
वधू + इष्ट = वध्विष्ट
गुरु + आज्ञा = गुर्वाज्ञा
मधु + अरि = मध्वरि
गुरु + औदार्य = गुर्वौदार्य
अनु + एषण = अन्वेषण
लघु + ओष्ठ = लघ्वोष्ठ
अनु + ईक्षक = अन्वीक्षक
अनु + ईक्षण = अन्वीक्षण
ऋ + असमान स्वर = र्
पितृ + आनन्द = पित्रानन्द
मातृ + अंश = मात्रंश
पितृ + उपदेश = पित्रादेश
मातृ + अर्थ = मात्रर्थ
पितृ + अंश = पित्रंश
वक्तृ + उद्बोधन = वक्त्रुद्बोधन
मातृ + आदेश = मात्रादेश
पितृ + इच्छा = पित्रिच्छा
मातृ + उपदेश = मात्रुपदेश
पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

अयादि संधि:-

 यदि प्रथम पद के अंत में ए, ए, ओ, और में से कोई एक स्वर आये तथा दूसरे पद के प्रारंभ में कोई स्वर वर्ण आये तो 'ए' को अय् , 'ऐ' को आय् , 'ओ' को अव् , तथा 'औ' को आव् हो जाता है।
अयादि संधि का संस्कृत में सूत्र “ एचोऽयवायाव:”
पहचान:- जिस शब्द में “अय् , आय् , अव् , आव् की ध्वनि आते तो वहां अयादि संधि होती है।
ए + कोई स्वर = अय्
ऐ + कोई स्वर = आय्
ओ + कोई स्वर = अव्
ओ + कोई स्वर = आव्
ए + कोई स्वर = अय्
ए + कोई स्वर = आय्
चे + अन = चमन
ने + अन = शयन
संचे + अ = संचय
विले + अ = विलय
पो + अन = पवन
ऐ + कोई स्वर = आय्
गै + अक = गायक
नै + अक = नायक
विधै + इका = विधायिका
नै + इका = नायिका
ओ + कोई स्वर = अव्
भो + अन = भवन
श्रो + अन = श्रवण
हो + इ = हवि
गो + ईश = गवीश
शो + अ = शव
ए + कोई स्वर = आय्
पौ + अक = पावक
नौ + इक = नाविक
प्रसौ + इका = प्रसाविका
भौ + अ = भाव
पौ + अन = पावन

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